मैं कायर निकला
[कविता :© कमलेश कमल]
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आज फ़िर मैं भीड़ में तन्हा था
कि विचारों के हुजूम ने हमला कर दिया
धर्म की ढाल
जातीय आस्था का कवच
कुछ भी पहना न था
घबराया देख यह सब
पर आक्रामक विचारों के विषैले बाण
वेध गए अंतरतम
सरपट दौड़ा
लेटा जा कर
तुम्हारी यादों की मजबूत आड़ में
सोचा
कि तुम कहाँ छूटी हो?
कि भला कौन निकालेगा तुम्हें
मेरे विचारों के स्वर्ग से
तभी एक बाण लगा आकर
जिसके बंकिम पार्श्व पर लिखा था:
तुम कायर निकले
साथ ही तुमने हस्ताक्षर किए थे
अपने चमकते अक्षरों में
अब मैं लेटा हूँ
पश्चात्ताप की लहू में
लथपथ और निढाल

