“मोहन की पीर”
माधव के मुख की कांति गई
मानो मृतप्राय हुए कान्हा
थीं यमुना भी आकुल व्याकुल
कनु ! तड़प उठे राधा -राधा
सहसा एक कमल कालिंदी में
मोहन से आकर लिपट गया
मानो वृषभानु कुमारी हों
ऐसे कान्हा में सिमट गया
थे बनवारी यमुना के तट
जड़ देह लिये मन खिन्न -खिन्न
राधे -राधे उच्चार रहे
फिर गूँज उठा हा कृष्ण ! कृष्ण
ये स्वर फूटा गोविंद बढ़े
हा राधे ! हाँ राधे – राधे !
यमुना विह्वल हो देख रही
कनु दौड़ पड़े यमुना आगे
ऐसे दौड़े जैसे कृष्णा की
लाज बचाने जाते हैं
नैनों में अश्रु धार लिये
राधे राधे चिल्लाते हैं
मायापति छलिया रासेश्वर !
अधीर दिखाई देते हैं
कितने हारे कितने टूटे
यदुवीर दिखाई देते हैं
वो प्रेमप्रणेता नन्द कुंवर
वो राधावर किस ओर गए
यमुना तकती रह गई डगर
क्या पता कहाँ चित्तचोर गए।
©️✍🏻पं . आरजू “अच्युत “

