June 15, 2024

Ajayshri Times

सामाजिक सरोकारों की एक पहल

साहित्यकार नरेंद्र कठैत  का पहला हिंदी आलेख संग्रह हुआ प्रकाशित ये बस खबर नही, उत्तराखण्ड से जुड़ी भाषाओं का अध्ययन का दस्तावेज है।

 

साहित्यकार नरेंद्र कठैत  का पहला हिंदी आलेख संग्रह हुआ प्रकाशित ये बस खबर नही, उत्तराखण्ड से जुड़ी भाषाओं का अध्ययन का दस्तावेज है।

ये ज्ञान के कठैत साहित्यकार नरेंद्र कठैत कृत हिंदी आलेख संग्रह की ऐसी पुस्तक है जो कहने को तो हिंदी की पुस्तक है। इस पुस्तक में हर एक आलेख उत्तराखण्ड कला साहित्य संस्कृति के साथ लोक में प्रचलित मातृभाषा और लोकभाषा का ही चिंतन मनन है लेखक के द्वारा। हिंदी साहित्य की पहली कोई ऐसी किताब होगी जो इतनी बारीकी के साथ उत्तराखंड से जुड़ी गढवाली कुमाऊनी सहभाषाओं के संवर्द्धन के लिए लिखी गयी हो। साथ ही पुस्तक के हर एक आलेख में पूर्व में प्रकाशित पत्र पत्रिका और सोशल मीडिया का तथ्यात्मक रूप से जानकारी प्रकाशित की गई है। कह सकते हैं लेखक ने कालजयी परिस्थितियों में समय समय मे आये भावों को संकलित कर एक पुस्तक रूप दिया। उत्तराखण्ड कला साहित्य संस्कृति में भाषा का अध्यन और शोध करने वालों के लिए यह एक उपयोगी ग्रन्थ साबित होगा। पुस्तक लेखक ने आदरणीय सुदामा प्रसाद प्रेमी जी समर्पित की है औऱ सुदामा प्रसाद प्रेमी जी तस्वीर के ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा है सादर समर्पित प्रातः स्मरणीय कलम के सिपाही पुस्तक में भूमिका डॉ नागेंद्र प्रसाद ध्यानी “अरुण” जी पूर्व उपनिदेशक , उत्तराखण्ड भाषा संस्थान ने लिखी है।

भूमिका में डॉ नागेंद्र प्रसाद ध्यानी  “अरुण” जी  लिखते हैं ” मेरा केन्द्रीय विश्वविद्यालय गढ़वाल एवं गुरू राम राय विश्वविद्यालय, देहरादून से विनम्र आग्रह है कि श्री नरेद्र कठैत के द्वारा गढ़वाली में रचित समग्र लोक साहित्य पर तत्काल शोधकार्य करवाया जाना अपेक्षित है।”

गढ़वाली में जहाँ तक मुझे ज्ञात है व्यंग्य विधा पर कोई भी उल्लेखनीय शोधकार्य नहीं हो पाया है। आशा है लोक साहित्य में रूचि लेने वाले पाठकों को श्री नरेन्द्र कठैत में अन्य लेखकों की अपेक्षा, कुछ अलग, कुछ विशेष, पढ़ने को अवश्य मिला होगा। मैं उनके भाषिक सौष्ठव, अर्थ गौरव ओर व्यंग्य लेखन की भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूँ। ओर चाहता हूँ उनके साहित्य पर शोधकार्य का शुभारम्भ हो; जिससे गढ़वाली भाषा में श्री कठैत के माध्यम से जिस नई शैली का उद्भव हो रहा है उससे मात्र गढ़वाली ही नहीं अपितु लोक भाषा और बोलियों के लेखन में जो तत्व उभरकर आएँगें उनसे ज्ञान के नए स्रोत खुलें।

लेखक नरेंद्र कठैत सादर ! करते हुए अपनी बात में लिखते हुए कहते भी हैं

सादर!

यूँ तो ये आलेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और सोसल मीडिया के माध्यमों में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। किन्तु आपकी सुविधा के निमित्त ये आलेख पुस्तक के रूप में संग्रहित कर दिए गए हैं। इनमें अधिकांश वे आलेख हैं जो उत्तराखण्ड की कला, साहित्य और संस्कृति की पृष्ठभूमि से उभरे हैं। अतः यदि आप यह भी कह दें कि आलेखों में स्थानीयता का पुट अधिक है- और इसी कड़ी में आपको तनिक भी यह लगे कि पंक्तियों में कुछ न कुछ की तस्वीर भी उभरी है तो यकीन मानिए आपका वह आँकलन भी मेरे लिए किसी पारितोषित से कम नहीं है।

पुस्तक में आवरण सज्जा व आलेख सम्बंधित रेखांकन चित्रकार आशीष नेगी का रहा। पुस्तक प्रकाशक अनूप सिंह रावत रावत ,डिजिटल पब्लिसिंग हाउस है।

 प्रकाशक द्वारा पुस्तक के आवरण  में   साहित्यिक गतिविधियों का जिर्क भी किया है पूर्व की भांति। साथ ही साहित्यकार नरेंद्र कठैत की पुस्तक ये ज्ञान कठैत के  पुस्तक आवरण के पृष्ठ में पहली बार  यह देखने को मिला पुस्तक आवरण में  सम्मान और पुरस्कारों जिर्क नही किया है। आज की कालजई परिस्थितियों में पुरुस्कार  प्रसांगिक नही रह गए हैं शायद यह सब सोच कर प्रकाशित नही किया हो।

पुस्तक प्राप्त के लिए पाठक निम्न पत्ते में सम्पर्क कर सकते हैं

रावत डिजिटल (बुक पब्लिसिंग हाउस)

131-132-A, न्यायखण्ड-2, इंदिरापुरम

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश – 201020

संपर्क नंबर : +91 9910679220

वेबसाइट: www.rawatdigital.in

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ISBN: 978-93-91893-06-4

प्रथम संस्करण: 2022

© नरेन्द्र कठैत

मूल्य: ₹250.00

 

समीक्षा : शैलेंद्र जोशी

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