February 27, 2024

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पुस्तक समीक्षा कमलेश कमल की कलम से पुस्तक :जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम’

‘पुस्तक समीक्षा कमलेश कमल की कलम से

पुस्तक :जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम’

आचार्य शुक्ल ने लिखा था कि ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के आवरण चढ़ते जाएँगे, त्यों-त्यों कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी। विडंबना ही कही जाएगी कि जीवनोपयोगी और मानवमात्र के कल्याण के लिए समझी जाने वाली विधा ‘कविता’ पर कलम चलाने वाले आज सबसे अधिक हैं, लेकिन उनके द्वारा लिखी हुई कविताओं को पढ़कर पाठक को ऐसा लगता नहीं कि उन्हें इन कविताओं की किञ्चित् भी आवश्यकता है। अस्तु, कवित्वविहीन कविता के इस दुर्धर्ष काल में जब इंटर बटन दबा-दबाकर मिनटों में कविताएँ लिखी जा रही हों एवं आत्ममुग्धता के उच्छवास को साहित्य-सर्जना समझ लिया जाता हो; किसी शोधपूर्ण एवं गंभीर साहित्यिक ग्रंथ का प्रणयन किसी बड़ी साहित्यिक-परिघटना से कम नहीं है।

जिम्मेदारीपूर्वक कहना चाहूँगा कि आज के साहित्यिक-परिदृश्य में बहुत कम पक्वधी साहित्यकार हैं, जो महनीय साहित्यकारों के साहित्यिक-अवदान की अवगाहना करने एवं तत्सम्बन्धी रेखांकन-मूल्यांकन करने का कठिन उद्यम करते हैं। उचित ही आश्वस्ति है कि प्रतिभाएँ विरल होती हैं और प्रतिभा को सराहना सबसे कठिन। ऐसे में, डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय द्वारा लगभग 31 वर्ष निवेशित कर ‘जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम’ ग्रंथ का प्रणयन करना किसी तापसिक-कृत्य से कम नहीं है।

विवेच्य ग्रंथ जयशंकर प्रसाद के सम्पूर्ण साहित्य के वस्तुनिष्ठ विश्लेषण और उनको उनका अपेक्षित स्थान दिलाने के महनीय लक्ष्य को लेकर लिखा गया है। इस ग्रंथ में सुचिंतित और सुस्पष्ट प्रविधि से यह सिद्ध किया गया है कि महाकवि जयशंकर प्रसाद हिंदी ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व-साहित्य में बीसवीं सदी के श्रेष्ठ कवि और रचनाकार हैं।

इसमें कोई अत्युक्ति नहीं कि प्रसाद न केवल भारतीय कविता की अस्मिता के प्रतीक हैं, वरन् अत्यंत संश्लिष्ट और समग्र-समर्थ सर्जक हैं, जिनके जटिल, विराट्, बहुस्तरीय एवं बहुआयामी साहित्य को किसी एक विचारधारा अथवा प्रतिमान के आधार पर विश्लेषित अथवा रेखांकित किया ही नहीं जा सकता। ध्यातव्य है कि केवल किसीको महान् अथवा सार्वकालिक महान् कह देने का कोई मूल्य नहीं और कदाचित् इसलिए ऐसी उद्घोषणाओं-उद्भावनाओं को पाठक गंभीरता से लेते भी नहीं। हाँ, जब अनुसंधित्सु-भाव एवं सूक्ष्मेक्षिका से कोई सिद्ध साहित्यकार अपना कार्य करे, तभी सुयोग से किसी ऐसे महनीय ग्रंथ का प्रणयन सिद्ध होता है। मुम्बई विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय के सामर्थ्य का परिचय पाठक इससे लगा सकते हैं कि वे समकालीन हिन्दी आलोचना में सक्रिय सबसे बड़े हस्ताक्षर हैं। इसप्रकार, प्रसाद जैसी अप्रतिम प्रतिभा के साथ न्याय करने के लिए उनसे समर्थ कलम और क्या होती?

ग्रंथकार ने गीता के अठारह अध्यायों की भाँति जयशंकर प्रसाद की महानता के अठारह प्रतिमान तय किए हैं एवं अपने विशद् ज्ञान एवं अद्भुत विश्लेषण-क्षमता से यह संसिद्ध किया है कि कैसे प्रसाद एक-एक प्रतिमान पर एकदम खरा उतरते हैं। साथ ही प्रसाद के जीवन और व्यक्तित्व के कई अनछुए पहलुओं पर भी इस पुस्तक में प्रकाश डाला गया है।

“इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रान्त भवन में टिक रहना।
किन्तु पहुँचना उस सीमा पर जिसके आगे राह नहीं।”

जयशंकर प्रसाद के आरंभिक दिनों की एक कृति प्रेम-पथिक की ये पंक्तियाँ कदाचित् हिंदी के सबसे अधिक प्रयुक्त उद्धरणों में से एक है, जिससे हिंदी की पीढ़ियाँ आगे बढ़ने और सतत श्रम करने के लिए अभिप्रेरित होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। अब ग्रंथकार की ऋषिसदृश-संदृष्टि देखिए कि वे इसे न केवल प्रसाद के व्यक्तित्व को विकासवान, सुसंगठित एवं गतिशील सिद्ध करने का आरंभिक बिंदु बनाते हैं; अपितु इसे धीमी आँच पर पकती प्रतिभा, सांस्कृतिक-धैर्य और गहन-बौद्धिकता के सूत्रों से अनुस्यूत कर इसे प्रसाद के जीवन का चरम लक्ष्य भी सिद्ध कर पाते हैं। *जब वे ऐसा करते हैं, तो संभव है कि प्रसाद के अध्येताओं को इस पंक्ति का स्मरण आ जाए–
“वन गुहा कुंज मरु स्थल में, ख़ोज रहा हूँ अपना विकास।”*

कामायनी के सामान्य अध्येता भी यह जानते हैं कि प्रसाद की काव्यात्मक दृष्टि शिवत्व से अनुप्राणित है। अस्तु, इस ग्रंथ में ग्रन्थकार की व्यासशैली हमें यह समझाने में सक्षम हो जाती है कि किस प्रकार उनकी अन्तर्दृष्टि शैवागम से उन्मीलित होकर प्रकाशरूपा-चिति के स्वरूप-विश्लेषण की ओर अभिमुख हो जाती है। वे कामायनी से ही वह प्रसंग ढूँढ कर लाते हैं, जब प्रलय-निशा की समाप्ति के उपरांत अरुणोदय के समय प्रबुद्ध हो रही प्रकृति के नेत्र निमीलित हो रहे हैं। देखें–
“कर रही लीलामय आनन्द, महाचिति सजग हुई सी व्यक्त।
विश्व का उन्मीलन अभिराम, इसी में सब होते अनुरक्त।।
काम मंगल से मंडित श्रेय, सर्ग इच्छा का है परिणाम।।”

इतना ही नहीं, इसी ग्रंथ में आगे वे प्रसाद को शैवागम से उन्मीलित विरुद्धों का सामंजस्य भी सिद्ध करते हैं और कुशलतापूर्वक करते हैं। लेकिन उससे पूर्व पृष्ठ संख्या 29 पर वे प्रसाद को ‘बड़े नास्तिक, सूक्ष्म, प्रश्नाकुल एवं क्रान्तिदर्शी साहित्यकार’ के रूप में रूपायित करते हुए इन्हें उनकी महानता के 18 आयामों में से एक मानते हैं। यहाँ ग्रंथकार से मेरी आंशिक असहमति है, विशेषकर उन्हें ‘बड़े-नास्तिक’ के रूप में चित्रित करने पर। इस असहमति के लिए निम्न पाँच बातें रखना चाहूँगा–

1.जब प्रसाद शिवत्व और शैवागम से अनुप्राणित थे; तो नास्तिक नहीं हुए। यद्यपि, ‘आस्तिक’ शब्द की अर्थावगाहना भिन्न-भिन्न प्रकार से की जा सकती है, तथापि मेरी सम्मति में मूलार्थ ‘अस्ति’ अर्थात् ‘है’ से संपृक्त ही रहेगा। ऐसे में, प्रसाद जैसी अप्रतिम और विरल प्रासादिक प्रतिभा ‘है’ को छोड़, ‘नहीं है’ को क्योंकर अपनाएगी? इसी ग्रन्थ में आगे जब ग्रन्थकार प्रसाद को ‘शैवागम से उन्मीलित विरुद्धों का सामंजस्य’ कहते हैं; तो किसी भी तर्कदृष्टि-संपन्न अध्येता को यह उचित प्रतीत होता है। ऐसे भी, बड़ी कलात्मक प्रतिभाएँ देश-काल-आस्था आदि तमाम सीमाओं का अतिक्रमण करती रही हैं, करती हैं और करती रहेंगी।

2. प्रतीत होता है कि ग्रन्थकार यहाँ सब कुछ देखते और समझते हुए भी प्रख्यात चिंतक जैनेन्द्र से असहमत होने का साहस नहीं कर पाए, जिन्होंने प्रसाद को पहले बड़े नास्तिक लेखक के रूप में स्थापित करने का यत्न किया था। जैनेन्द्र निश्चित ही बड़े लेखक और चिंतक थे, परंतु कदाचित् विचारधारा-विशेष से प्रेरित थे। इससे आगे ‘जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि’ के सिद्धांत पर सहज समझा जा सकता है। जब उन्होंने प्रसाद की अतिशय-सप्रश्नता, प्रखर-बौद्धिकता, क्रान्तिदर्शिता आदि को नास्तिकता के निकष के रूप में देखा; तो इससे बौद्धिक सहमति नहीं हो सकती। प्रश्नाकुलता आस्तिकता में भी सम्भव है और हम जानते हैं कि आस्तिक साधक के सहस्र प्रश्न हो सकते हैं। विचारणीय यह है कि अगर प्रश्नाकुलता नास्तिकता है, तो प्रसाद से बड़े नास्तिक विवेकानंद थे।

3.बौद्धिकता नास्तिकता से जुड़ी है, यह निष्कर्ष ही भ्रामक है।

4.क्रान्तिदर्शी बदलाव चाहते हैं और बदलाव अथवा परिवर्तन का आकांक्षी व्यक्ति तत्त्वतः, ‘आस्तिक’ भी हो सकता है और ‘नास्तिक’ भी। निराला ने किसी निबंध में लिखा है– “क्रान्ति साहित्य की जननी है। नवीनता तभी पैदा होती है और तभी साहित्य का रथ कुछ कदम आगे बढ़ता है।” अतः, हम कह सकते हैं कि क्रान्तिदर्शी होना नास्तिक होने से जुड़ा नहीं है।

5.अंतिम और सबसे महत्त्वपूर्ण बात कि अगर श्री जैनेन्द्र से सहमत होकर हम प्रसाद को थोड़ी देर के लिए नास्तिक मान भी लें; तो एक और समस्या आती है– नास्तिकता अपने आप में महानता का आयाम कैसे हो सकती है, भला?

असहमति के इस एक बिंदु को छोड़ दें, तब कुछ ऐसे स्थल भी आते हैं, जहाँ मत-वैभिन्य हो सकता है, लेकिन ग्रन्थकार की निष्पत्ति को ग़लत भी नहीं कहा जा सकता। उदाहरणार्थ, पृष्ठ संख्या 448 के दूसरे पैराग्राफ में ग्रन्थकार ने लिखा है कि प्रसाद का चिन्तन और संवेदनात्मक औदात्य रवींद्रनाथ से अधिक है। अपने वैदुष्य और गहन अध्ययन से वे इसे सिद्ध भी करने का यत्न करते हैं, परन्तु कला-जगत् में ऐसी निष्पत्तियाँ व्यक्तिगत अभिरुचि का प्रतिफलन होती हैं, जिनपर मत-वैभिन्य संभव है। शेष, ग्रंथकार के विशद् और आत्यंतिक ज्ञान के साथ-साथ उनकी अपूर्व विश्लेषनात्मक सामर्थ्य और रचनात्मक-गाम्भीर्य से चमत्कृत हुए बिना नहीं रहा जा सकता। उदाहरण के लिए, साहित्य के पाठकों को प्रसाद की विश्वदृष्टि और समय और काल के अतिक्रमण के काव्यात्मक सामर्थ्य का परिज्ञान कामायनी में मिलता है…यहाँ तक कि आज की सबसे बड़ी वैश्विक समस्या, आतंकवाद की चिंता कामायनी में है–
“विश्व विपुल आतंक-त्रस्त है, अपने ताप विषम से।
फैल रही है घनी नीलिमा, अंतर्दाह परम से।।”

अस्तु, इस ग्रंथ के अनुशीलन से हम इससे आगे जानते हैं कि नव-नवोन्मेष शालिनी, मधुमयी एवं जागरूक प्रतिभा किस प्रकार विश्व-जीवन और लोकहित के प्रति इससे कहीं अधिक सचेष्टता के साथ समय-समाज, सभ्यता-संस्कृति, दर्शन-मनोविज्ञान आदि के वृहत्तर आयामों एवं विराट् बिम्बों के प्रति सायास-चेतन थी।

प्रसाद के कहानीकार रूप का मूल्यांकन करते समय ग्रंथकार उनकी कहानियों में राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना, अद्वितीय प्रेम-सौंदर्य, प्रकृति-पर्यावरण, आदर्श-यथार्थ, इतिहास-समकालीनता, अंतर्दृष्टि-विश्व-संदृष्टि के साथ-साथ सघन सर्जनात्मक पाठ-वितान और अन्तर-पाठीय लयतान भी देखते हैं। साहित्य के अध्येता इससे अवगत हैं कि यह अन्तर-पाठीय लयतान उत्तरआधुनिकता का परिचायक है। इस प्रकार, यहाँ बिना उत्तर-आधुनिकता का उल्लेख किए ग्रंथकार ने प्रसाद के मूल्यांकन का बृहद् वितान तान दिया। अगली ही पंक्ति में जब ग्रन्थकार उनकी रचनाओं में संवेदनाओं का जादुई ऐन्द्रजालिक लोक का उल्लेख करते हैं, तो सुधी अध्येता विस्मय-विजडित हुए बिना नहीं रह सकते।

इस ग्रंथ में में प्रसाद का मूल्यांकन करते समय प्रसाद की महानता का एक आयाम महाकाव्यात्मक रंग-परिकल्पना के भीतर बहुआयामी अर्थ-स्वरों का अनुप्रयोग करना भी माना गया है। इस संदर्भ में पृष्ठ संख्या 68 पर कलकत्ता के रंगकर्मी विमल लाठ के हवाले से लिखा गया है कि प्रसाद के सभी नाटक अभिनेय हैं। वस्तुतः, हिंदी आलोचना ने अपनी और रंगमंचीय सीमाओं को जयशंकर प्रसाद पर आरोपित कर दिया, क्योंकि विश्व के जितने भी महान् नाटक हैं, उनमें इतनी जटिलता और बहुस्तरीयता होती है कि उनके साहित्यिक एवं रंग-मूल्यों का सम्यक् निर्वचन कर पाना आसान नहीं होता।

इतना ही नहीं, इसके अनन्तर, ग्रंथकार ने यह सिद्ध किया है कि प्रसाद भारतीय अस्मिता के मौलिक अन्वेषी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रशस्त चित्रकार थे, जिन्होंने न केवल विविध विषयों में विश्वस्तरीय लेखन किया, बल्कि सत्यं, शिवं, सुंदरम् के स्वरूप-विश्लेषण द्वारा उदात्त की सिद्धि भी की।

यहाँ इस ग्रंथ से इतर यह जोड़ना समीचीन होगा कि ऐसा नहीं है कि प्रसाद की रचनाओं और उनके व्यक्तित्व पर स्वतंत्र रूप से कम कार्य हुआ है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक : ‘कामायनी एक पुनर्विचार’ में मुक्तिबोध ने कामायनी को एक विराट् फैंटेसी के रूप में व्याख्यायित किया और उनकी अकाट्य तर्कदृष्टि से इस महाकाव्य के इर्दगिर्द पूर्ववर्ती सौन्दर्यवादी-रसवादी आलोचकों द्वारा जो प्राचीर खड़ी की गई थी, वह भूलुंठित हो गई। कदाचित् इसका कारण था कि मुक्तिबोध इसकी आंतरिक छानबीन करते हुए पात्रों को विशुद्ध मानव-चरित्र के रूप में आँकते हैं और वस्तुसत्य की परख के लिए समाजशास्त्रीय आँख का उपयोग करते हैं। इसी प्रकार डॉ. हरिहरप्रसाद गुप्त ने ‘प्रसाद : काव्य प्रतिभा और संरचना’ में प्रसाद की प्रतिभा (भावयित्री और कारयित्री) को व्यापक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित किया है। ‘ध्रुवस्वामिनी परिशीलन’ में डॉ. निर्मला जैन ने प्रसाद के नाटक के पात्रों और विशेषकर नारी-पात्रों के उद्वेग, छटपटाहट, मुक्ति की आकांक्षा आदि को विश्लेषित करते हुए कुछ नए आयामों को रेखांकित किया है। ऐसे शताधिक उदाहरण ढूँढे और दिए जा सकते हैं; परंतु प्रसाद के समग्र व्यक्तित्व, उनका अवदान, उनकी रचनाओं में अंतर्निहित वैशिष्ट्य आदि के आधार पर महानता के आयामों की ऐसी विस्तृत विवेचना करने वाली यह संभवतः पहली और इकलौती पुस्तक है।

निश्चितरूपेण, साहित्य के सुधी-पाठकों, प्राध्यापकों सहित हिंदी के विद्यार्थियों, शोधार्थियों के लिए इस ग्रंथ को पढ़ना एक महत्त्वपूर्ण अनुभव होगा। केवल प्रसाद की महानता के विविध आयामों की तार्किक विवेचना पढ़कर समृद्ध होने के लिए ही नहीं; वरन् इस पुस्तक को इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि किसी व्यक्तिकेन्द्रित कृति को किस प्रकार लिखा जाना चाहिए। किसी ऐसे ग्रंथ का विन्यास कैसा हो, उसके निकष क्या हों, तर्कसरणी कैसी हो…यह सब इस कालजयी ग्रंथ के अनुशीलन से सहज सीखा जा सकता है। यद्यपि विधा भिन्न है, तथापि प्रसाद के परिप्रेक्ष्य में इस ग्रंथ ने वही कार्य किया है, जो शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के लिए विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखित जीवनी, अमरकृति ‘आवारा-मसीहा’ ने किया। इस ग्रंथ का व्याप अपेक्षाकृत विस्तृत और बहुरंगा है, जो अकादेमिक होते हुए भी रोचक है। उदाहरण के लिए जब कामायनी में अंतर्निहित उत्तर-आधुनिकता का प्रसंग आता है, तब पृष्ठ संख्या 208-209 में उपस्थिति-अनुपस्थिति, प्रकटन और विलोपन की मुग्धकरी क्रीडा से आगे बढ़कर मनु का इड़ा के साथ अतिचार के प्रयास में उत्तर-आधुनिकता के यौन-सम्बन्धों में स्वेच्छाचारिता का तत्त्व देखना एवं प्रकारांतर से विकसनशील मनोविज्ञान(Evolutionary Psychology) के निष्कर्षों को संकेतित कर देना रोचक भी है और सर्जनात्मक-कौशल भी।

निष्पत्ति के रूप में कहा जा सकता है कि जब तक हिंदी-जगत् में प्रसाद के बारे में पठन-पाठन होता रहेगा, इस ग्रंथ की उपादेयता अक्षुण्ण बनी रहेगी। मेरी विनम्र सम्मति में इसे हिंदी आलोचना-जगत् की महदुपलब्धि के रूप में देखा और समझा जाना अभीष्ट होगा।

राजकमल समूह के राधाकृष्ण प्रकाशन ने 463 पृष्ठ के इस पुस्तक को प्रकाशित किया है। अभी सजिल्द संस्करण ही उपलब्ध है, जिसका मूल्य है 1495 रु। पुस्तक की गुणवत्ता और उपादेयता असंदिग्ध है, तब भी विद्यार्थियों के लिए किसी पुस्तक का इतना मूल्य अधिक ही है।

[लेखक भाषा-विज्ञानी एवं बेस्टसेलर
लेखक हैं।]

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