May 30, 2024

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लोक आस्था के महापर्व छठ की विविधरंगी रश्मियों को समेटता आलेख कमलेश कमल

लोक आस्था के महापर्व छठ की विविधरंगी रश्मियों को समेटता आलेख कमलेश कमल
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लोक आस्था का महापर्व

सनातन-संस्कृति में ‘धर्म’ का प्रमुख स्थान है, परंतु बड़ी बात है कि यहाँ धर्म ‘लोक’ और ‘उत्सव’ से परिचालित होता है। साथ ही, यहाँ के पर्व-त्योहारों के मूल में ‘प्रकृति के साथ सहकार’ एक मूल-तत्त्व होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है– कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से सप्तमी तिथि की सुबह तक मनाया जाने वाला षष्ठी-पर्व अथवा छठ-पर्व। यह बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं अन्य राज्यों में बसे लाखों लोगों की आस्था का महान् पर्व है। हम देखते हैं कि कोशी-मिथिला का क्षेत्र, सूर्यपुत्र कर्ण के अंग का क्षेत्र, ‘मग’ ब्राह्मणों के बसने से बने मगध क्षेत्र से लेकर उत्तरप्रदेश के सरयूक्षेत्र तक में इस पर्व को अत्यधिक नियम-धरम(धर्म) एवं निष्ठा के साथ मनाया जाता है।

वस्तुतः, इस पर्व के साथ जो लोक-आस्था दिखती है, उसे वे लोग समझ ही नहीं सकते, जिन्हें इसकी महत्ता का पता नहीं है अथवा इसके कारणों की समझ नहीं है। ऐसे भी, कुछ छद्म-बुद्धिजीवियों द्वारा एक फैशन की तरह सनातन-संस्कृति एवं जन-जीवन से जुड़ी आस्थाओं एवं मान्यताओं का मजाक उड़ाया जाता रहा है। आस्था का महापर्व ‘छठ’ इसका एक विशिष्ट उदाहरण है।

होना तो यह चाहिए कि हम अपने पर्व-त्योहारों से जुड़ी आस्थाओं, मान्यताओं, मूल-भावनाओं और उनके पीछे के विज्ञान को समझें। साथ ही, इन पर्वों से सन्नद्ध ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ एवं ‘सर्वे सन्तु निरामयाः’ जैसे आर्ष-उद्घोषों को अंगीकार करें; लेकिन हो कुछ और रहा है। एक कप चाय मिलने में देर होने पर जिनका मूड ऑफ हो जाता है, वे लोग तीन-तीन दिन तक भूखे रहकर और नदी के ठंडे जल में सुबह-शाम देर तक खड़े रहकर पूजा-उपासना करने वालों का मजाक उड़ा कर अपनी चरम बौद्धिकता का परिचय देते हैं; बिना इसकी वैज्ञानिकता और दार्शनिकता को समझे, इस पर्व के बारे में ऊलजलूल टिप्पणी करते हैं।

इस पर्व की महत्ता को समझने से पूर्व ‘पर्व’ शब्द के अर्थ को समझ लेना समीचीन होगा। यह ‘पर्व’ शब्द ‘पर्व्’ धातु में अच् प्रत्यय जुड़कर बना है; जिसका अर्थ है– पूर्ण, पूरित, संधि, गाँठ आदि। ऐसे पर्व तीन प्रकार के होते हैं– नित्य, नैमित्तिक और काम्य। नित्य पर्व निश्चित तिथि को होते हैं, जैसे रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आदि। नैमित्तिक पर्व किसी विशेष अवसरों पर संपन्न किए जाते हैं, यथा जन्मोत्सव, विवाहोत्सव, श्राद्ध-कर्म आदि। काम्य पर्व कुछ विशेष कामना की पूर्ति हेतु मनाए जाते हैं, यथा– सूर्यषष्ठी अथवा छठ। यह छठ-पर्व उत्तम पुत्र की प्राप्ति अथवा अन्य कामनाओं की पूर्ति हेतु मनाया जाता है।

ध्यातव्य है कि छठ एक महान् पर्व होने के साथ-साथ ‘व्रत’ भी है। छठ करनेवाली महिलाओं को ‘व्रती’ कहकर ही पुकारा जाता है। यह ‘व्रती’ बना है– व्रत से और व्रत शब्द की निर्मिति है– ‘वृ’ धातु में ‘अतच्’ प्रत्यय के जुड़ने से। ‘वृ’ का अर्थ चयन, स्वीकार, प्रार्थना, निवेदन आदि है। व्रत में यही भाव सन्निहित है। सूर्य की उपासना और प्रार्थना तो मूल में है ही; पर इसमें शुचिता अथवा शुद्धि का भी अत्यधिक ध्यान रखा जाता है। यम, नियम आदि का ध्यान रखते हुए सूर्य की उपासना करने से अंतःकरण शुद्ध होता है, वातावरण और समूचा पर्यावरण परिशुद्ध हो जाता है।

कार्तिक के शुक्ल पक्ष चतुर्थी को नहाय-खाय से छठ आरंभ होता है। नहाय-खाय का अर्थ है साफ-सफाई कर नहाकर अथवा स्नान कर निष्ठापूर्वक भोजन करना। कह सकते हैं कि यह पर्व की तैयारी करना और परिशुद्ध होना है। नहाय-खाय के दूसरे दिन अर्थात् पञ्चमी तिथि को मनाए जाने वाले ‘खरना’ व्रत के अलग-अलग अर्थ लिए जाते हैं, जबकि भषा-विज्ञान के आधार पर यह स्पष्ट है कि यह खरा (शुद्ध) होने की क्रिया है। जैसे ‘पढ़’ से पढ़ना है, ‘लिख’ से लिखना है, वैसे ही ‘खर’ से खरना है। खरना अर्थात् व्रत द्वारा शुद्ध होने की क्रिया। इसके इतर किसी तरीके से इसका अर्थ उद्भेदन भाषा-विज्ञान की दृष्टि से असाधु है।

विदित है कि षष्ठी की संध्या जहाँ अस्ताचल गामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, वहीं सप्तमी की सुबह उद्याचल गामी मार्तण्ड को अर्घ्य देकर इस पर्व का उद्यापन होता है। यह महत्त्वपूर्ण है कि विश्व में सूर्योपासना जहाँ-जहाँ है, वहाँ उगते सूर्य की ही पूजा की जाती है, जबकि इस पर्व में उगते और डूबते दोनों सूरज की आराधना की जाती है। बिहार के औरंगाबाद में स्थित देवार्क मंदिर पश्चिमाभिमुख सूर्य की उपासना के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर के निर्माण का काल ईसा पूर्व पाँचवी सदी से ईसा की पहली सदी तक जाता है। इससे पता चलता है कि इस क्षेत्र में सूर्योपासना अर्थात् छठ की कितनी सुदीर्घ परम्परा रही है।

सूर्य की पूजा के संदर्भ में यह जानना चाहिए कि चराचर जगत् के दृश्यमान् देवताओं में सूर्यदेव सबसे प्रमुख हैं। वे प्रतिदिन दिखते हैं और उनके दिखने से ही जीवन है। अगर सूर्यदेव दिखना बंद कर दें, तो पूरी पृथ्वी बहुत कम समय में एक निर्जीव बर्फ़ का गोला बनकर रह जाएगी। कदाचित् यही कारण है कि ऋग्वेद में सूर्य को पृथ्वी का उत्पादक, विश्व की आत्मा एवं पिता कहा गया है। इस पर्व में इस भाव से सूर्य को अर्घ्य देकर उनकी पूजा की जाती है।

मान्यताओं की बात करें, तो षष्ठी को सूर्य की बहन भी माना गया है, जिसे मातास्वरूपा मान कर संतान-प्राप्ति हेतु असीम श्रद्धा और विश्वास के साथ यह पर्व मनाया जाता है। छठ शब्द कैसे अस्तित्व में आया, यह जानना भी रोचक है। यह षष्ठी तिथि है। आगे ‘षष्ठी’ लोकप्रयोग में ‘छठी’ बन गया। कालांतर में ‘छठी’ से छठ शब्द बना और अब यह ‘छठ’ के नाम से ही जाना जाता है।

इस छठ पर्व को लोक-पर्व भी कहा जाता है।
यहाँ ‘लोक’ शब्द सामान्य श्रेणी के नर-नारी अथवा आमजन का परिचायक है। इसका निहितार्थ यह है कि आम जनता एवं निचले शिक्षित संस्तर के लोगों की भी आस्था इसमें ख़ूब है। साथ ही, कोई मंत्रोच्चार, कोई पुरोहित वर्ग इसमें अपेक्षित नहीं होता– यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है।

लोक-गीत, लोक-धुन, लोक-आस्था एवं लोक-विश्वास के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व बड़ा विशिष्ट है। दूर-दराज में बसे लोग भी घर आने का हर संभव प्रयास करते हैं और जो नहीं जा पाते वे भी किसी विधि इसका प्रसाद प्राप्त हो जाए इसके लिए प्रयास करते हैं।

ध्यान से देखें, तो रामायण काल से लेकर अब तक की अनेक परंपराओं का सुंदर समंजन इसमें मिलता है। महर्षि अगस्त्य द्वारा श्रीराम को सूर्य की उपासना करने हेतु आदित्य हृदय स्तोत्रम् का उपदेश किया गया। लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने पर श्रीराम के द्वारा सरयू में ‘छठ-पर्व’ मनाया जाने का वर्णन मिलता है।

त्रेता युग में रामायण के पश्चात् द्वापर के महाभारत काल में सूर्योपासना का उपदेश ऋषि धौम्य द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर को किया गया। (महाभारत : वन-पर्व 03/16-23, 160/24-36)

आगे महाभारत में ही, दुर्योधन द्वारा कर्ण को अंग प्रदेश का राजा बनाया जाने के पश्चात् सूर्य-पुत्र कर्ण द्वारा गंगा जी में सूर्यदेव की आराधना में छठ-पर्व मनाए जाने का उल्लेख मिलता है। उल्लेख है कि अंगराज कर्ण कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी और सप्तमी को सूर्यदेव की विशेष आराधना करता था। इसके अतिरिक्त, अज्ञात-वास के समय कुंती और द्रोपदी द्वारा भी छठ पर्व का वर्णन मिलता है।

छठ पर्व के प्रतीक को देखें, तो यह प्रकृति की महत्ता को रूपायित करता है। इसमें गन्ना, केला, डाभ नींबू आदि गंगा के मैदानी इलाकों में होने वाले फलों की महत्ता एवं पवित्रता को रेखांकित किया गया है। बाँस से बने सूप का प्रयोग इसमें बहुत ही महत्त्व रखता है। ध्यान दें कि बाँस को वंशवृद्धि का प्रतीक माना गया है और भाषा-विज्ञान के अनुसार दोनों शब्दों का मूल एक ही है। वंश के वाहकों के लिए बाँस के सूप से जीवनदाता-सूर्य को जीवन के आधार जल में खड़े होकर अर्घ्य दिया जाता है।

इसके पकवानों को देखें, तो अनाज से कूट-पीस कर बनाए जाने वाले ठेकुआ, खबौनी अदि प्रमुख हैं, जिनमें कोई मिलावट नहीं होती, अर्थात् ये परिशुद्ध होते हैं। ध्यान दें कि इन पर पीपल के पत्तों की छाप होती है, जो इस क्षेत्र में फले-फूले बौद्ध धर्म में भी अत्यंत पवित्र माना गया है। इस तरह इसमें धार्मिक सहिष्णुता का भी सूत्र है।

प्रश्न उठता है कि छठ पर्व मनाने का प्रयोजन क्या है? वस्तुतः, चतुर्थी तिथि को मनाए जाने वाले नहाय-खाय से आरंभ यह व्रत तन और मन की शुद्धि के लिए है। कामना यही रहती है कि इस शुद्धि से संतान के विचारों में शुद्धता आए और वह स्वस्थ रहे, सूर्य-सम ओजस्वी-तेजस्वी बना रहे।

प्रश्न उठता है कि कैसे मनाएँ छठ? मिथिला के ‘वर्षकृत्य-विधि’ नामक ग्रंथ में सूर्यषष्ठी अथवा प्रतिहार षष्ठी के संदर्भ में इसका विवरण मिलता है–

कार्तिके शुक्ल पक्षे तु, निरामिष परो भवेत् ।
पंचम्यामेकभोजी स्यात्, वाक्यं दुष्टं परित्यजेत्।।
षष्ठ्यां चैव निराहारः, फल पुष्प समन्वितः ।
सरित्तटं समासाद्य, गन्धदीपैर्मनोहरैः ।।
धूपैर्नानाविधैर्दिव्यैर्नैवेद्यैर्घृत पाचितैः ।
गीत वाद्यादिभिश्चैव, महोत्सव समन्वितैः ।।
समभ्यर्च्य रविं भक्त्या, दद्यादर्घ्यं विवस्वते ।
रक्त चन्दन समिश्रं, रक्तपुष्पाक्षतान्वितम् ।।

इसका अर्थ है कि कार्तिक शुक्ल पक्ष में सात्त्विकता से पूर्ण वातावरण में निवास करते हुए, पंचमी के दिन एक बार भोजन करना चाहिए और वाक् संयम करते हुए षष्ठी अथवा छठी के दिन पूर्ण निराहार रहकर अनुष्ठान करना चाहिए। पत्र-पुष्प-फल-घृतपक्व नैवेद्य-धूप-दीप आदि सामग्री लेकर नदीतट पर जाकर, गीत, वाद्य आदि से हर्षोल्लास पूर्ण वातावरण में जल में खड़े होकर भगवान् भास्कर का पूजन करना चाहिए। रक्तचन्दन- रक्तपुष्प और अक्षत आदि से युक्त अर्घ्य समर्पित करना चाहिए।

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि ‘छठ’ लोकआस्था का महान् पर्व है, जिसमें व्रत और साधना से शुद्धि और सिद्धि की सामूहिक चेतना दिखती है। ऐसे भी, भारतीय संस्कृति में साधना का प्रारंभ श्रद्धा और विश्वास से होना माना गया है। रामचरितमानस में लिखा भी है–

“बिनु विश्वास भगति नहीं, तेहि बिनु द्रवहिं न राम।
राम कृपा बिनु सपनेहु, जीव न लह विश्राम ।।”
अस्तु, विश्वास के बिना भक्ति होती भी नहीं। इसे समझने के लिए भी शक्ति चाहिए।
ऐसे में हम प्रार्थना कर सकते हैं कि छठी मईया सबको इस लोकपर्व की महत्ता को समझने का सामर्थ्य दें, उत्तम स्वास्थ्य एवं धन-धान्य से परिपूर्ण करें! इति शुभम् !

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