February 27, 2024

Ajayshri Times

सामाजिक सरोकारों की एक पहल

ज्यादातर गीत पुरुष मानसिकता के क्यों होते हैं

श्रृंगार गीत एक तरफ प्रेम के गीत ज्यादातर पुरुष प्रदान ही क्यों होते हैं बस एक पुरूष नारी को एक झलक देखता है गीत शुरू कभी उसको चाँद की तो कभी फूलों की उपमा दे देता है। जैसे नारी बस इनके देखने भर के लिए रह गयी हो। ज्यादातर गीत पुरुष मानसिकता के क्यों होते हैं जैसे कोई खूबसूरत लड़की सड़को में निकले कोई हीरो टाइप बनकर गाने लग जाओ तू चाँद है तू फूल है गुलाब है हम भंवरो तरह तुझे मंडराते रहेंगे तेरे आगे पीछे क्या किसी नारी का सुंदर होना यही रह गया है सड़को में चलते पुरुष गाने गाए हमने आज तक ऐसी नारी नही देखी फिर लग जाओ गाने में तू फूल है तू चाँद तुझ जैसी कोई नही देखी। गहराई से सोचो नारियों की तरफ से कभी ऐसे गीत नही बने तू बहुत खूबसूरत है तू चांद लग रहा है तू मेरा नायक बन ही जा मेरा प्रेम स्वीकार कर ही कर ही कर। पुरूष मानसिकता गीत में स्त्रियों को सिर्फ देखने और निहारने की वस्तु बना दिया है ज्यादात्तर मंचीय संस्कृति औऱ बाजारवाद ने , प्रेम देखने चीज नही है प्रेम शरीर की काया गोरा या काला होना भी नही प्रेम गीत किसी फेयरनेस क्रीम एड भी नही जिसमे गोरा होने सुंदरता हो। प्रेम की अभिव्यक्ति सूरत की सीरत बदलने में आजकल के गीतकारों मंथन करना चाहिए। प्रेम श्रृंगार गीत पुरुष मानसिकता की सोच तक सीमित न रह जाये इसका स्तर व्यापक होना चाहिए आज 21 वीं सदी जब नारी अंतरिक्ष यात्रा तय कर चांद तक पहुंच गई हर कार्यक्षेत्र में नारी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही हैं कला साहित्य संस्कृति से लेकर ज्ञान विज्ञान शोध चिकित्सा और सेना सब जगह नारियों अपना परचम लहराया है। पर आजकल मंचीय बाजारवाद गीतकारों ने नारियों को गीत में बस फूल चांद गोरे रंग औऱ पुरुष निहारने की वस्तु समझ रखा है। गीतों में श्रृंगार और प्रेम अभियक्ति पुरुष मानसिकता से बहार निकलने का समय आ गया है।

प्रसिद्ध शायर एवं गीतकार निदा फाजली ने भी सस्ते गीतों और बाजारवाद की मजबूरी में शेर में लिखा भी हैमीरो ग़ालिब के शेरों ने किसका साथ निभाया है सस्ते गीतों को लिख-लिख के हमने घर बनवाया है

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