May 29, 2024

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लाइक व्यूज सब्सक्राइब के बीच रिदम गायक का एक युग

लाइक व्यूज सब्सक्राइब के बीच रिदम गायक का एक युग

उत्तरखंडी रिदम के प्राणनाथ रिदम के संत सुभाष पांडेय जिनकी उंगलियां ढोलक से लेकर तबले से लेकर ढोल दमौ हो या हुड़का डौर थाली से जम्बे जैसे सात समुद्र पार के रिदम वादय यन्त्र में भी पहाड़ी लोक तालो बाजाने वाले पांडेय जी उंगलियां की गवाह ये जैम्बे साउथ अफ्रीका की रिदम में भी झेकु झेंनता बजाने सिद्धहस्थ उत्तरखंडी गीत संगीत में रिदम के नया रूप और संगीत की बात होगी सुभाष पांडेय जी नाम सबसे पहले आयेगा । ये उत्तरखंडी तालो के जाकिर हुसैन है ।

उत्तराखंड के म्यूजिक में सबसे अदभुत शिल्प
सुभाष पांडेय जी की रिदम

कहा जाता किसी गाने में सुर बिखर जाए तो एक बार चल भी जाये मतलब संगीत में बेसुरा चल भी जाये पर बेताला नही चलता ताल का बहुत महत्त्व है गीत संगीत में , संगीत की आत्मा ही ताल है ,

आज उत्तराखंड संगीत में सबसे मजबूत कड़ी मुझे कोई लगती है वो चीज सुभाष पांडेय जी की प्रयोगधर्मी रिदम कितना ही हल्का गीत संगीत को अगर उसमे सुभाष पांडेय की रिदम है तो गाने और म्यूजिक में जान आ जाती है और अगर श्रेष्ठ और मेलोडियस गीत है तो सुभाष पांडेय की रिदम और खूबसूरत लगती है ,

उत्तरखंडी रिदम के प्राणनाथ रिदम के संत सुभाष पांडेय जिनकी उंगलियां ढोलक से लेकर तबले से लेकर ढोल दमौ हो या हुड़का डौर थाली से जम्बे जैसे सात समुद्र पार के रिदम वादय यन्त्र में भी पहाड़ी लोक तालो बाजाने वाले पांडेय जी उंगलियां की गवाह ये जैम्बे साउथ अफ्रीका की रिदम में भी झेकु झेंनता बजाने सिद्धहस्थ उत्तरखंडी गीत संगीत में रिदम के नया रूप और संगीत की बात होगी सुभाष पांडेय जी नाम सबसे पहले आयेगा । ये उत्तरखंडी तालो के जाकिर हुसैन है ।

उत्तराखंड के म्यूजिक में सबसे अदभुत शिल्प
सुभाष पांडेय जी की रिदम

कहा जाता किसी गाने में सुर बिखर जाए तो एक बार चल भी जाये मतलब संगीत में बेसुरा चल भी जाये पर बेताला नही चलता ताल का बहुत महत्त्व है गीत संगीत में , संगीत की आत्मा ही ताल है ,

आज उत्तराखंड संगीत में सबसे मजबूत कड़ी मुझे कोई लगती है वो चीज सुभाष पांडेय जी की प्रयोगधर्मी रिदम कितना ही हल्का गीत संगीत को अगर उसमे सुभाष पांडेय की रिदम है तो गाने और म्यूजिक में जान आ जाती है और अगर श्रेष्ठ और मेलोडियस गीत है तो सुभाष पांडेय की रिदम और खूबसूरत लगती है ,

सुभाष पांडेय मुझे इस तरह शिल्पी लगते वो हर बार कुछ नया करने की सोचते है उनके पास रिदम का अच्छा क्राफ्ट और समझ है उनसे निकाला आना चाहिए , कम्मोजर अरेंजर या गायक को , सुभाष पांडेय रिदम के अदभुत शिल्पी है

अगर उत्तरखण्ड म्यूजिक में कुछ नया और खास है तो वो है सुभाष पांडेय जी की रिदम ।

पहाड़ के सुदूर गावों में एक लड़का जो बचपन से संगीत और लोक संगीत का शौकीन है जो रेडियो में तालों को कानों में घण्टे गाने सुनता तो कभी अपनी पसंद के गानों की कैसेट में लगाकर सुनता कभी गावों में बेड़ा परम्परा के ढोलक में उसका मन रमता तो कभी वो ढोल दमौ के मंडाण में उसका मन रमा रहता वो कभी गावों की रामलीला के संगीत उसके मन को भाता कही भी आस पास कोई मेला या प्रोग्राम होता वो उमंग के साथ ऐसे सांस्कृतिक प्रोग्रामो में पहले जाता उसको डब्बे स्कूलों की टेबल हर जगह वो हाथों से बाजाता ही रहता कोई ताल उसकी यही साधना उसको गुलाबी नगर जयपुर ले गयी जहां उसने तबले का ज्ञान लिया संगीत सीखा सुभाष पांडेय निकल पड़ा 90 के दशकों में दिल्ली के तरफ जहां कही उत्तराखंड कैसेट एल्बमों में उन्होंने रीदम बजायी किन्तु सुभाष पांडेय को मुख्य पहचान मिली गढगौरव नरेंद्र सिंह नेगी की एल्बम समदोला का द्वी दिन और करगील लड़े मा छोऊ इसके बाद नरेंद्र सिंह नेगी की सभी एल्बम और मंचो की शान सुभाष पांडेय बन गये लोकगायक चन्द्र सिंह राही , जगदीश बकरोला ,शिव दत्त पन्त गजेंद्र राणा मंगलेश डंगवाल प्रीतम भरतवाण किशन महिपाल कल्पना चौहान मीना राणा और आज के दौर के नए फ्यूजन गायको सभी के साथ सुभाष पांडेय रीदम में संगत कर रहे है वो एक कुशल रिदम अरेंजर है ढोल दमौ ढोलक तबला हुड़का वो सभी ताल वाद्य प्ले करते है , तबले औऱ ढोलक में लोक तालों और ढोल दमौ को बजाने का अभिनव प्रयोग सुभाष पांडेय ने किया , गढगौरव नरेंद्र सिंह नेगी द्वारा पीतल के ढोल दमौ प्रयोग को भी मंच से सुभाष पांडेय जैसे कलावन्तों ने बजाया है जम्बे जैसे वेस्टर्न ताल वाद्य में भी सुभाष पांडेय जैसे कलाकारों ने ढोल दमौ का पैर्टन बजाकर लोक रीदम की फील दी आज लोक बेड़ा शैली की ताले ढोल दमौ की मंडाण ताले स्टेज शो और रिकॉर्डिंग स्टूडियो में लोकप्रिय है जिसका श्रेय सुभाष पांडेय जैसे कलावन्तों को जाता है जो उत्तराखंड के पहाड़ो से स्ट्रगल कर उत्तराखंड की तालों और रीदम को एक मुकाम देते आज नये नये युवा संगीतकार सुभाष पांडेय की रीदम शैली को फ्लो करते है आज सुभाष पांडेय रिदम के साथ म्यूजिक अरेंज भी कर रहे है पर रिदम में उनका काम हिमालय जितना है उन्होंने उत्तराखंड की रिदम को एक पहचान दी अपने नवीन प्रयोगों से एक प्रयोगधर्मी कलाकार है सुभाष पांडेय दो दशकों से एक लंबा अनुभव उनका रहा रिकॉर्डिंग और स्टेज शो का ऐसे रिदम कलावंत का उत्तराखण्ड लोकमानस से होना गौरव की बात है।

सुभाष पांडेय मुझे इस तरह शिल्पी लगते वो हर बार कुछ नया करने की सोचते है उनके पास रिदम का अच्छा क्राफ्ट और समझ है उनसे निकाला आना चाहिए , कम्मोजर अरेंजर या गायक को , सुभाष पांडेय रिदम के अदभुत शिल्पी है

***उत्तराखंड रिकॉर्ड संगीत के तालों के सुर से सजा गायक
और तालों में लिपिबद्ध लेखक गायक का नाम सुभाष पांडेय होता है **

दिल्ली हो या मुम्बई देहरादून हो या हल्द्वानी पौड़ी हो या श्रीनगर जिस भी नगर में उत्तराखंड संगीत बनता सजता सँवरता है उस हर स्टूडियो तक सुभाष पांडेय तालों की लेखनी गढी लिखी मिलती है ज्यादातर ।
उत्तराखंड रिकॉर्ड संगीत में तालों के लेखक का नाम सुभाष पांडेय कोई भी नया पुराना गायक हो अगर उसमे सुभाष पांडेय के हाथों ने उस गीत में रिदम की भाषा गड़ी है तो उस गीत खनक बढ़ जाती है । कोई नया गीत हो या रिमिक्स या डीजे बीट से सजा गीत हो या कोई फ्यूजन हो अगर उसमें सुभाष पांडेय रिदम ने लिपिबद्ध है तो गीत और भी सुरीला हो जाता है । कही बार तो बहुत हल्का गीत भी जिसमे सुर या संगीत कुछ भी अच्छा न लग रहा पर अगर उसमे सुभाष पांडेय जी के रिदम से सजा ढोल का मंडाण हो या कोई ढोलक तबले की ताल में सुभाष पांडेय जी रिदम बज रही हो तो गानों में एक अलग ही खूबसूरती उभरती है कोई भी नये उत्तराखंड लोक से जुड़े गीत में जब रिदम सुनते है सुभाष पांडेय हाथों की खनक दिल दिमाग अलग असर छोड़ती है सुभाष पांडेय को तालों गायक या तालों लेखक कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी । उत्तराखंड संगीत का ये युग ही सुभाष पांडेय से सजा युग है ।

 

अगर उत्तरखण्ड म्यूजिक में कुछ नया और खास है तो वो है सुभाष पांडेय जी की रिदम ।

पहाड़ के सुदूर गावों में एक लड़का जो बचपन से संगीत और लोक संगीत का शौकीन है जो रेडियो में तालों को कानों में घण्टे गाने सुनता तो कभी अपनी पसंद के गानों की कैसेट में लगाकर सुनता कभी गावों में बेड़ा परम्परा के ढोलक में उसका मन रमता तो कभी वो ढोल दमौ के मंडाण में उसका मन रमा रहता वो कभी गावों की रामलीला के संगीत उसके मन को भाता कही भी आस पास कोई मेला या प्रोग्राम होता वो उमंग के साथ ऐसे सांस्कृतिक प्रोग्रामो में पहले जाता उसको डब्बे स्कूलों की टेबल हर जगह वो हाथों से बाजाता ही रहता कोई ताल उसकी यही साधना उसको गुलाबी नगर जयपुर ले गयी जहां उसने तबले का ज्ञान लिया संगीत सीखा सुभाष पांडेय निकल पड़ा 90 के दशकों में दिल्ली के तरफ जहां कही उत्तराखंड कैसेट एल्बमों में उन्होंने रीदम बजायी किन्तु सुभाष पांडेय को मुख्य पहचान मिली गढगौरव नरेंद्र सिंह नेगी की एल्बम समदोला का द्वी दिन और करगील लड़े मा छोऊ इसके बाद नरेंद्र सिंह नेगी की सभी एल्बम और मंचो की शान सुभाष पांडेय बन गये लोकगायक चन्द्र सिंह राही , जगदीश बकरोला ,शिव दत्त पन्त गजेंद्र राणा मंगलेश डंगवाल प्रीतम भरतवाण किशन महिपाल कल्पना चौहान मीना राणा और आज के दौर के नए फ्यूजन गायको सभी के साथ सुभाष पांडेय रीदम में संगत कर रहे है वो एक कुशल रिदम अरेंजर है ढोल दमौ ढोलक तबला हुड़का वो सभी ताल वाद्य प्ले करते है , तबले औऱ ढोलक में लोक तालों और ढोल दमौ को बजाने का अभिनव प्रयोग सुभाष पांडेय ने किया , गढगौरव नरेंद्र सिंह नेगी द्वारा पीतल के ढोल दमौ प्रयोग को भी मंच से सुभाष पांडेय जैसे कलावन्तों ने बजाया है जम्बे जैसे वेस्टर्न ताल वाद्य में भी सुभाष पांडेय जैसे कलाकारों ने ढोल दमौ का पैर्टन बजाकर लोक रीदम की फील दी आज लोक बेड़ा शैली की ताले ढोल दमौ की मंडाण ताले स्टेज शो और रिकॉर्डिंग स्टूडियो में लोकप्रिय है जिसका श्रेय सुभाष पांडेय जैसे कलावन्तों को जाता है जो उत्तराखंड के पहाड़ो से स्ट्रगल कर उत्तराखंड की तालों और रीदम को एक मुकाम देते आज नये नये युवा संगीतकार सुभाष पांडेय की रीदम शैली को फ्लो करते है आज सुभाष पांडेय रिदम के साथ म्यूजिक अरेंज भी कर रहे है पर रिदम में उनका काम हिमालय जितना है उन्होंने उत्तराखंड की रिदम को एक पहचान दी अपने नवीन प्रयोगों से एक प्रयोगधर्मी कलाकार है सुभाष पांडेय दो दशकों से एक लंबा अनुभव उनका रहा रिकॉर्डिंग और स्टेज शो का ऐसे रिदम कलावंत का उत्तराखण्ड लोकमानस से होना गौरव की बात है।

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