June 16, 2024

Ajayshri Times

सामाजिक सरोकारों की एक पहल

वर्तमान में गढ़वाली भाषा को गढ़वाली वर्तनी के हिसाब लिखने वाला एक मात्र साहित्यकार नरेंद्र कठैत का व्यंग छन्नी

वर्तमान में गढ़वाली भाषा को गढ़वाली वर्तनी के हिसाब लिखने वाला एक मात्र साहित्यकार नरेंद्र कठैत का व्यंग छन्नी पढ़े

छन्नी

छन्नी ब्वनू सौंगू च पर छन्नी जनि कनी नी। छन्नी एक भांडु बि च अर एक चीजबस्त बि। यि बि कि छन्नी छुटी बि छन अर बड़ी बि। छुटा कामौ तैं छुटी छन्नी अर बड़ा कामौ तैं बड़ी छन्नी। हरेक छन्नी चा वा छुटी हो य बड़ी वा अपड़ि सामर्थ लैक काम कन्नी। क्वी छन्नी मोटू छणणी। बरीक बि छन क्वी छन्नी छणणी। एक बात या बि कि जैं चीज पर टेक नी वा कै बि छन्नी पर टिक्दि नी। पर इन बि नी कि ज्वा चीज छन्नी बिटि छिर्किणी वा ठीक अर जु नी छिर्क सक्णी वा फुंड ढोळीं।

दरसल छन्यू काम इथगा सौंगु बि नी।
छन्यू तैं जन खौड़-कटग्याड़ तनी कीड़ू-माखू बि। वूं मद्दि छन्नी न कैकि ज्यान लेणी न वा कै तैं कचमोड़णी। छन्या नजीक रैकि छन्यू एक गुण यू बि देखी कि छन्या ऐथर हर क्वी अपड़ा हाथ बढ़ाणू पर छन्नी कैका बि ऐथर अपड़ा हाथ नी पसार्नि। असल बात त या च कि छन्या संस्कारु मा लोभ-लालच कबि रयी नी। काम कर्द-कर्द छन्नीन अपड़ि भूख-प्यास बि दब्ये यलि। कै खुणी? अफु खुणी? अरे न भयी हम खुणी! वा त रात दिन बिचारि जन हम चाणा तनी छणणी! छणणी! अर छणणी! ठंडा दिमागन जरा सोच ल्या दि कि तुम खुणी छणी चीज जरुरी छन या अणछणी?

एक बात या बि कि छन्नी छुटी होवु चा बड़ी-नौ मा कैका बि फरक नी। छन्नी से कणसी बि छन्नी अर छन्नी से मंझली बि छन्नी। छन्नी बूढ़ नन्नी बि छन्नी अर छन्नी बूढ़ ददि बि छन्नी। छन्नी ब्वे बि छन्नी अर छन्नी चच्ची बि छन्नी! छन्यू नाती बि छन्नी अर छन्नी नत्येण बि छन्नी। अलाणी बि छन्नी अर फलाणी बि छन्नी। सबि जगा छन्नी! छन्नी अर छन्नी!

कति लोग्वा दिमाग मा य बात बि उठणी ह्वलि कि छन्नी बूड़ नन्नी से लेकि छन्नी ब्वे तक गिणै यनि पर क्य छन्यू बुबा नी? देखा जी! सीधी अर सच्ची बात या च कि जु लोग जुवा, दारु अर भंगलाऽ नस्सा मा जगा-जगा सुंगूर सि प्वड़यां रैनी, ब्यखुन दौं घौर ऐकि बि जौंन जनान्यूं कि चुफली रिंगैनी, बिचार्यूं का हडगा सकसैनी, नौना-बाळा मन्नी-कुटनी, दुन्या वूं कमबख्तू नौ नि लेंदी। इलै नि पूछा छन्यू बुबा छैं च कि नी।

कुछ लोग यि बि ब्वल्दन कि छन्या ऐथर देबी लगौण कि श्रीमती?
द ल्या! य त वी छ्वीं ह्वेगि कि बल -‘हे भुली क्य ब्वन मिन त्वे खुणी?’ अपड़ैस मा त भलू लग्दू तू ब्वन बि। पर छन्नी तैं यीं बातै जमा बि परबा नी कि वींका ऐथर क्वी देबी लगावू चा श्रीमती। तुमारि नजर मा छन्नी लाटी-जांगी ह्वलि पर वा लाटी-जांगी बि नी।

एक बात हौर जी! छन्यू क्वी गुरु नी। छन्नी क्वी चेली बि नी।
वींकु मठ बि नी। छन्यू ठौ-ठिकाणू वक्खि जख वींकि जरोरत प्वड़दि। अगर छन्नी तैं बि पूछा- त्यरु गौं कख च छन्नी? जबाब मिल्दू- छन्नी! पट्टी क्व च?- छन्नी! जिला को च?-छन्नी! प्रदेस को च?-छन्नी! देस को च?-छन्नी! छन्नीन त हिंदू-मुसळिल-बौध-सिख-इसै सब्यूं दगड़ा अफु रळेयलि। वा अलग बात च छन्नी छाती मा तुमुन कम्पनी मोर लगैकि वा कब्जैयलि। छन्यू एक ही धरम च ज्वा वा जणणी! ज्वा वा छणणी!

छण्द-छण्द मनखी थक जाणू पर छन्नी नि थक्णी।
कति लोग ब्वल्दन छन्नी मा अपड़ो दिल, दिमाग आंखा कंदूड़ नी। हमतैं वूं लोगू तैं बि पुछुण प्वड़ि- तुमुन सिवलिंग मा क्य देखी? मन लगी त तुमुन लुटमल्या ढुंगा मा बि परमेसुर देखी कि नी देखी। अरे जख मन जी नी त दिल दिमाग, हथ खुटटा, आंखा कंदूड़¨न क्य कन जी? अच्छा! इन बता छन्नी क्य नी कन्नी? जैं चीजै हमतैं जरोरत नी या ज्वा चीज हमारा मतलबै नी, छन्नी वीं चीज तैं थमणी-रुक्णी- छ कि नी! क्या इथगा मौ-मदद तुम तैं कम लगणी? अरे भई! छन्नी नी त बिमारी नि फैलणी।

कति लोग इन बि ब्वल्दन कि – जु कुछ कना छां हम कना छां छन्नी त सुद्दि हिलणी। हमतैं तौं बि पुछुण प्वड़ि- अगर सौब कुछ तुम कना छां अर छन्नी कुछ नी कनी त तुमतैं वींका घुंडा पकड़णै क्य जरोरत पड़ी? अगर तुमारा बसै सकणी बि छै अर तकणी बि त तुमारि छन्नी किलै च चट्ट पकड़ी। क्या तुमतैं मालुम नी- छन्नी उमळदा-तातन अपड़ो जीतम फुकणी। कै खुणी? क्य अफु खुणीं? अरे हम खुणी।

चा उमळगी त छन्नी! दूध मा खौड़ प्वड़गी त छन्नी! पाणी साफ नी त छन्नी! माटा मा गारा छन त छन्नी! ग्यूं मा झुमळी त छन्नी। गौथ भट्ट मा घूण त छन्नी। सैद ही क्वी मनखी हो जैन ऐन मौका पर छन्यू नौ नि सूणी। तब बि ब्वना छयां छन्नी कुछ नि कन्नी। आखिर तुम चाणा क्य छां जी? रुस्वाड़ा से लेकि खल्याण अर चिणै तक त तुमारी छन्नी झोकीं। फिर्बि ब्वना छयां छन्नी क्य कनी? छन्नी तैं त कबि पुछणै जरोरत हि नी प्वड़दि कि वींकी काम कनै मर्जी छैं च कि नी। किलैकि वा त अपड़ो काम कनी लगीं। अजि छन्यू तैं कुछ ब्वन से पैली अपड़ा आंखा कंदूड़ खोला जी!

एक दिन इनी एका मनखिन हैंका मनखी तैं पूछी- हो जी! जरा देखा दि तुमारा रुस्वाड़ा मा क्य नी? तवा, परात, गागर, गिलास,थाली, करछी छैं च कि नी? हैंकन जबाब दे- देख्ण क्या च यी सबि धणी छैं छन जी! पुछुण वळन फेर ऐथर पूछी- अर रासन-पाणी, चा-चिन्नी-पत्ती? यां पर बि जबाब मिली- परमेसुरै किरपन रासन-पाणी, चा-चिन्नी-पत्ती बि काम चलौण लैक छयीं छन जी! आखिर मा एक सवाल यि बि पूछैगी- अर तुमारा रुस्वाड़ा मा छन्नी छैं च कि नी? बस! यांकू वे क्वी जबाब नी मिली। इनी माण ल्या कि तुमारा रुस्वाड़ा मा छन्नी नी त यांकु मलब तुम तैं अपड़ा सरेलै जमा बि चिंता नी। सोचा अगर रुसाड़ा मा छन्नी नी त चा दगड़ा पत्ती बि चबौण प्वड़लि कि नी। चार मनख्यूं का बीच पत्ती चबौण क्या सब्यता मण्येली जी? वुन त ग्यूं दगड़ा न झणी कथगा घूण पिस्ये ग्येनी पर जु घूण-झुमळी-झमळी छन वू त छंणेली। अर बिगर छन्या त वून छण्येण नी। बोला अगर हमुन जरा बि गलत बोली!

खैर! अपड़ा रुस्वाड़ा मा तुम छन्नी रखा चा नि रखा तुमारि मर्जी। पर छन्नी अफ्वी कैका गौळा नि प्वड़नी। छन्नी क्वी लपझप बि नि जणदि। छन्नी दगड़ा क्वी दलबल य वींमा क्वी झंडा-डंडा बि नी। कितली दगड़ा बि छन्यू उथगी धरमचारु च जथगा गारा-माटा-ब्वळचा दगड़ी। हौर त हौर छन्नी मा क्वी ऐब बि नी। वा कर्मठ च कामचोर त छयीं नी। ब्वनै बात त छयीं छन यी। समझु चा नि समझु क्वी। पर जाणी बूझी बौग मनू बि ठीक नी। असल बात त या च कि छन्नी जथगा गैरी च उथगी घैक बि। पर हम मनख्यूं मा इथगा गैरा स्वचणै बुद्धि बि कख रैगी जी!

एक बात हौर सूणा जी!
छन्नी तैं जथगा प्यारु दूध उथगी प्यारु पाणी बि, पत्ती बि अर चिन्नी बि। पर दुन्या झणी किलै छन्या घौ कुरेदणी रांदि, छन्यू मन टटोळदि। दुन्या यी देख्दि कि वीं मा सामर्थ छैं च कि नी। इन बोला दि छन्नी क्य नि कनी। हमारि इच्छा होणी त वा छणणी। हम इन बि नि बोल सक्दां कि वींकी इच्छा नि होणी य वा ना ब्वनि। कति दौं त इन लग्दू कि हम मद्दि औड़िकीटी छन्नी तैं नी समझुण चांदू क्वी। पर छन्नी तैं तांकि बि क्वी परबा नी। वुन त कु नि जणणू कि छन्नी जन क्वी नी।

जरा एक बात हौरि बतावा दि! दुन्या मा छ क्वी इनि चीज जैंकु क्वी जल्मबार नी। तुम क्या स्वचणा छयां छन्यू क्वी जल्मबार नी ? पर असल बात या च कि छन्नी मा धन नी। अर नया जमानौ यु चलन सि ह्वेगि कि जै मा धन नी वेकु जन्मदिन नी। वुन त छन्नी कै बिटि श्रीफल, चूड़ी-बिंदी, चुन्नी त मंगणी छ नी। न कै बक्यन वींकी तिरपां बिटि बोली। अर श्रीफल, चूड़ी-बिंदी, चुन्नी दे बि देल्या त तुमारि खुसी! वुन बि कौन सि क्वी देबी यूं चीजबस्त्यूं तुम बिटि मंगणी। वूं देबी -भगवत्यूं तैं बि तुम अपड़ि खुसिन ही त देणा छयां जी। पर सूणा जी! छन्नी तैं कुछ चऐणू बि नी। अर छन्नी मा छ बि क्या – वो दुन्या दिख्णी। लुकौण ढकोण लैक छन्नी मा त कुछ छयीं नी।

एक बात हौर याद औणी!
यीं बात तैं हम क्या सर्रा मन्था जणदि! लुकौण, ढकौण, बचौंणू तैं लोगुन बड़ा-बड़ा जुद्ध लड़नी। कै खण्ड खैल्नी। यका बदला कइ-कइ मुण्ड कटनी। लड़ी-लड़ी तैं सि ल्वेन धर्ती लाल कर गेनी। आखिर मा न सि बच्नी न वू बच सक्नी। याद छन कि नी गंगा पुत्र भीष्म जी? ना ब्वल्दू -ब्वल्दू सि बि लड़ै मा कुदनी। मालुम नि लड़दु-लड़दू तौं पर कथगा घौ लगनी। पर छन्नी त हमारि आंख्यू समणी स्या च दिन-रात दुखणी। इन लगणू जन छन्या निसाण त उनि छन जन हमुन सुरु मा देख्नी पर अब घौ दुखदि-दुखदि मजबूत लोखर सि बण गेनी।

इथगा जुल्म होण पर्बि छन्नी कबि थकी नी। छन्नी दुख तकलीफ एक ना कयि छन जी! पर छन्नी अज्यूं बि अपड़ो फर्ज निभौण हि लगीं। हम दिखणा छां वींकि सर्रा ज्यान एक डिमटळम च अटकीं। फिर्बि छन्नी न त डर्नी, न घबड़ौणी, न क्वी हायतौबा कनी। दिन-रात उमळदा-तातन भळकेणी! फुकेणी! ब्वन क्या च काचा-पाका डाम वींका मन हि मा छन जी।

आज बि इथगा दुख-तकलीफ मा बि वींकू तैं क्वी पराया नी। वू चा-पत्ती हो चा चिन्नी, क्वी गारु-माटु हो चा क्वी घबळांदू जीब। छन्नी सब्यूं तैं च हिलौणी, ढुलौणी, तोलणी सी। ठीक उनी जन हमारि ‘बी माता’ सी। प्रभू त्यरि इनि माया बि हमुन न कबि पढ़ी न कबि देखी न कबि सूणी।

क्वी माणू चा नि माणू परमेसुरौ रूप च छन्नी!

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